*कहां जाकर रुकेगी पत्रकार और सिस्टम के तकरार की रफतार
विवेक तिवारी
मुरैना । हाल ही में पत्रकारों पर फर्जी मामलों में फंसाने के आरोप और पुलिस कार्रवाई का विवाद सामने आया है, जहां पत्रकारों पर खबरें छापने के बदले दबाव बनाने या झूठे मुकदमों की शिकायतें दर्ज होने के मामले चर्चा में रहे । इसके विपरीत, पत्रकारों पर हमले और पुलिस द्वारा पत्रकारों को अवैध हिरासत में लेकर प्रताड़ित करने के गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं । पत्रकार और सरपंचों के बीच विवाद का ये पहला मामला नहीं है । कुछ रोज पहले तीन पत्रकारों पर एफआईआर का मामला सामने आया उससे पहले प्रशासनिक अधिकारी तथा एक तथाकथित नेता द्वारा यूट्यूबर पर मामला दर्ज कराया गया, भिंड में पत्रकारों का मामला दिल्ली तक पहुंचा लेकिन कभी पत्रकारों का तो कभी सिस्टम का पलड़ा भारी होता रहा ।
मुख्य घटनाक्रम और उसके विपरीत विवाद झूठे मुकदमों का आरोप प्रत्यारोप अक्सर आम बात है । मुरैना में फिलहाल स्थानीय स्तर पर पत्रकारों द्वारा गंभीर अपराधों या स्थानीय मुद्दों की खबरें प्रकाशित करने के बाद उनके खिलाफ कथित तौर पर झूठे मामलों और एफआईआर दर्ज किए जाने को लेकर विवाद हुआ है । जाहिर है पंचायतों के सरपंच, सचिव अथवा कोई पत्रकार दूध का धुला नहीं है । लेकिन सिस्टम में रहकर सरकारी रकम जो आम जनता के दिए हुए टैक्स से नगर, शहर, ग्रामविकास के लिए शासन या सरकार के माध्यम से आई है। उसका उपयोग नियमानुसार होना चाहिए । बहरहाल सिस्टम ओर पत्रकारों का विवाद बढ़ता ही जा रहा है , दोनों ओर से पुलिस को आवेदन देने की प्रक्रिया हो चुकी है । अब देखना यह है कि निष्पक्ष जांच होने के बाद इस विवादित मामले का पटाक्षेप कहां जाकर होता है ?
*पुलिस उत्पीड़न और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप:*
हाल ही में अंबाह क्षेत्र में एक पत्रकार ओमकार गुर्जर के साथ पुलिस द्वारा मारपीट और उन्हें अवैध हिरासत में रखने का गंभीर मामला सामने आया था, जिस पर ग्वालियर हाई कोर्ट ने मुरैना एसपी को 3 महीने के भीतर निष्पक्ष जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।इसके अलावा कई बार वरिष्ठ पत्रकारों के खिलाफ षड्यंत्र रचने और झूठे आवेदनों के आधार पर कार्रवाई की मांग के मामले भी स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए हैं । हालांकि प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ग्वालियर प्रेस क्लब पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर बड़ी रणनीति तैयार कर रहा है ।

